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बेबाक कलम
कश्मीर की नई मीडिया नीति का स्वागत क्यों नही हो ?

(अनिल सक्सेना /बेबाक ललकार)

2 जून को घोषित हुई केन्द्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर प्रशासन की नई मीडिया नीति का विरोध घाटी के कई पत्रकार कर रहें है। सवाल यह है कि जब वहां के पत्रकार जानते है कि कश्मीर की स्थिति ठीक नही है और जो भी असली पत्रकार होगा वो सुरक्षा एजेंसियों से क्लियरेंस ले ही लेगा तो डर कैसा ?

जम्मू-कश्मीर प्रशासन की नई मीडिया नीति के तहत सरकारी विज्ञापन के लिए सूचीबद्व करने से पहले अखबार के संपादकों, प्रकाशकों और अन्य प्रमुख स्टाफ के लिए उनकी पृष्ठभूमि की जांच करना आवश्यक है । हमारा मानना है कि जम्मू-कश्मीर के हालात को देखते हुए किसी भी पत्रकार या मीडियाकर्मी की पृष्ठभूमि की जांच कराने में किसी को भी परेशानी नही होनी चाहिए । हम सही है तो डर कैसा ?

कोई पत्रकार गलत होगा या उसकी पृष्ठभूमि गलत होगी तभी तो जम्मू-कश्मीर प्रशासन जांच के आधार पर किसी को फर्जी, अनैतिक और देशद्रोही घोषित कर सकता है और पत्रकारों या मीडिया संगठन के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि जम्मू-कश्मीर की प्राथमिकता सुरक्षा और सीमा पार से समर्थित आंतकवाद को खत्म करना है और इस कारण कई महत्वपूर्ण फैसले जरूरी है, इसके चलते जम्मू-कश्मीर की नई मीडिया नीति उचित ही है ।

दूसरी ओर राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम के अध्यक्ष होने के नाते मेरा मानना है कि मीडिया नीति बनाने से पहले किसी भी सरकार को वरिष्ठ पत्रकारों और मीडिया संगठनो से सलाह-मशविरा करना ही चाहिए । सरकार मीडिया नीति बना रही है और मीडिया से संबधित लोगों से बात ही नही की जाए, वो तो ठीक नही है लेकिन यह सब सामान्य हालातों में ही उचित है।

सच तो यह है कि आज पत्रकारिता और पत्रकारों की बुरी हालात के जिम्मेदार हम पत्रकार ही है। बड़े मीडिया संस्थान तो मीडिया संगठनों की बात छापते ही नही है और जब उन पर मुसीबत आती है तो मिमियाने लगते है। संपादक और पत्रकार बिना मीडिया मालिकों की सहमति के किसी के खिलाफ सच भी नही छाप सकता है। कड़वा सच तो यह है कि अब मीडिया संस्थान भी व्यापारिक संस्थान बन चुके है। सरकारें यह समझती है और जब उसे मौका मिलता है तब व्यापारिक संस्थान बनी मीडिया को अपने इशारों पर नचाती है और नही माने तो नेस्तानाबूद करने में देर नही करती है। लेकिन इस सबके बाद भी कहीं ना कहीं आज भी पत्रकारिता जिन्दा है और इसी ईमानदार पत्रकारिता के कारण ही सच जीत रहा है , भले ही देरी से जीते ।

जम्मू-कश्मीर की मीडिया नीति के बारें में तो यही कहंूगा की पहले देश की सुरक्षा और बाहरी आंतकवाद से छूटकारा जरूरी है । सम्पूर्ण कश्मीर हमारा है और हम शांति बहाल कर बाहरी दखल को बर्दाश्त नही करेंगे , सरकार इस दिशा में काम कर रही है तो फिर जम्मू-कश्मीर प्रशासन की मीडिया नीति से घाटी के पत्रकारों का विरोध क्यों ?

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