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पहले पूरी तरह कोरोना से जीत तो लें हम हिंदुस्तानी
“(अनिल सक्सेना ’ललकार’) शाश्वत भैया के पास मोबाइल आया, वे पर्यावरण के एक प्रोजेक्ट के लिए जिले के एक गांव में व्यस्त थे । फोन उठाया तो दूसरी ओर से बोला गया कि आपको कोरोना योद्वा के लिए सम्मान कर रहें है । उन्होनेे मना किया और कहा कि वे अभी शहर से दूर है तो दूसरी ओर से कहा गया कि कोई बात नही जब आप आओगे तब सम्मान कर देंगे लेकिन अभी हम आपको सम्मान करने की खबर मीडिया को मेल कर रहे है। यूथ मूवमेंट के अध्यक्ष शाश्वत भैया कुछ कहते तब तक फोन कट चुका था । इसका मतलब यह है कि उस संस्था ने सम्मान तो नही किया लेकिन अखबारों में खबर भेज दी कि सम्मान कर दिया क्यों कि उनके लिए सम्मान करने से बड़ी बात अखबार में उनकी संस्था की खबर लगने की है।

इसी तरह से मेरे पास भी कई फोन आए और सम्मान करने की बात कही , मैने उन लोगों का मन रखने के लिए हां कर दिया लेकिन मैं सम्मान के लिए कभी नही पहंुचा।

देश कोरोना जैसी महामारी से लड़ रहा है और हम सभी हिंदुस्तानियों ने दो माह से भी ज्यादा समय बड़ी ही कठिनाईयों में बिताया है। आज भी हम सभी कोरोना को हराने में लगे है और सरकार के निर्देशों को मानकर कोरोना से जीतने का प्रयास कर रहें है और यह तय है कि हम हिंदुस्तानी कोरोना को हरा कर ही रहेंगे ।

देश में कई संस्थाएं कोरोना योद्वा को सम्मान देने के लिए प्रशस्ति पत्र भेंट कर रही है, अच्छी बात है और प्रोत्साहित करने के लिए सम्मान भी जरूरी है। लेकिन क्या अभी इस तरह का सम्मान घर-घर जाकर देना ठीक है ? क्या हम कोरोना को हरा चुके है।

अभी सोशल मीडिया में जयपुर के मेरे पत्रकार मित्र की पोस्ट पढ़ रहा था, जिसमें लिखा था कि कोरोना योद्वा को सम्मान देने के लिए एक संस्था हजार रूपये ले रही है। वो संस्था किसी को भी कोरोना योद्वा का सम्मान देने के लिए तैयार है भले ही वह अपने घर से पूरे लाॅक डाउन में घर से निकला भी ना हो। अब इसमें कितनी सच्चाई है यह वही जाने लेकिन इस तरह की बातें पढ़कर मन दुखी हो गया।

कोरोना योद्वा का सम्मान करने वाली संस्थाएं यह नही जानती कि लाॅक डाउन के दिनों में सच के कोरोना योद्वाओं ने क्या-क्या सहन किया । जब फील्ड में होते तब स्वयं कोरोना योद्वा की क्या मानसिक स्थिति होती, यह बात कोरोना योद्वा ही जानते है , इनके पीछे परिवार के सदस्य किस डर से समय बिताते, यह कोरोना योद्वा से ही जानिए या उनके परिवार के सदस्यों से पूछिए । रातों को नींद नही आती और डर भी सताता रहता कि फील्ड में रहने से कुछ हो ना जाए । लेकिन समाजसेवा का जूनून अगले दिन फिर फील्ड में पहुंचा देता । मैने यह सब नजदीक से जाना क्यों कि मेरे पुत्र यूथ मूवमेंट के अध्यक्ष शाश्वत सक्सेना और स्वयं मैंने इस कोरोना काल में काम किया और अभी भी काम कर रहें है । इन दिनों में मेरी मां, मेरी पत्नी और मेरी बेटी की क्या चिंताए है , यह सब हम समझ रहे थे और कहीं ना कहीं हम भी डर रहे है ।

सम्मान करने वालों से मेरा आग्रह है कि आप सम्मान कर रहें है , बहुत अच्छी बात है लेकिन सम्मान को हल्का कर सच के कोरोना योद्वाओं का अप्रत्यक्ष रूप से अपमान मत कीजिए । अपनी सम्मान लिस्ट में अपने और अपने लोगों को शामिल नही कीजिए जो इस कोरोना काल में घर से भी नही निकले हो । असल के कोरोना योद्वाओं का सम्मान कर आप अपनी संस्था का ही सम्मान कर रहे है , यह ध्यान रखिए। सच्चे कोरोना योद्वाओं का सम्मान जरूर कीजिए लेकिन पहले पूरी तरह कोरोना से जीत तो लें ”हम हिंदुस्तानी“

(सन् 1949 से प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र ”ललकार“ समूह के संपादक श्री अनिल सक्सेना का बेबाक कलम पढ़ने के लिए www.lalkarnews.com क्लिक कीजिए )
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