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मैं मौत के मूंह में , लगा इतिहास दोहराया जा रहा है
मैं मौत के मूंह में , लगा इतिहास दोहराया जा रहा है

(मेरी बात/अनिल सक्सेना)

साल 2013 , जब मेरी मां समान बड़ी बहन का अंतिम संस्कार कर उज्जैन से चित्तौड़गढ़ के लिए कार से निकला । वो दिन भूल नही पाऊंगा , नीमच से पहले कार ड्रायवर की गलती से ट्रक से टकरा गए । कार पूरी डैमेज हो गई और मैं कार मैं फंस कर बेहोश हो गया । भगवान हनुमान जी की कृपा ही थी कि बेहोश होने से पहले मैने अपने निम्बाहेड़ा के पत्रकार मित्र मनोज सोनी को मोबाइल लगाकर अपनी बात कह दी । इसी बीच ग्रामीणों ने एम्बुलेंस बुला दी और मैं नीमच के सरकारी हाॅस्पिटल के लिए रवाना हो गया ।

नीमच हाॅस्पिटल में होश आया तो पता चला कि मेरी आधा दर्जन पसलियां टूट चुकी है और लंग्स भी डैमेज हो गया था। दम तो था ही , मैने चित्तौड़ के मेरे एक चिकित्सक मित्र को मोबाइल किया और पूरी बात बताई तो उन्होने मुझे चित्तौड़ अपने निजी चिकित्सालय में बुला लिया । लेकिन अगले ही दिन से मेरा स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। डा. दिनेश वैष्णव जी को बुलाया गया और उन्होने मुझे उदयपुर जाने की सलाह देकर जल्दी ही चित्तौड़ से रवाना कर दिया। आगे तो और भी हालात खराब होने थे , उदयपुर पहुचते ही रात को मेरा आॅपरेशन किया गया । सांस लेने में समस्या थी इसलिए आॅक्सीजन लगा दी गई । उदयपुर में अगले दो दिन और खराब निकले और मेरी हालत को देखते हुए वेंटिलेटर मशीन पर ले लिया गया । मेरे वेंटिलेटर पर आते ही मेरी पत्नी , मेरी बेटी और बेटा परेशान। मुझे लगा कि भगवान कहीं इतिहास दोहरा तो नही रहा है। मेरे पिताजी का देहंात तब हुआ था, जब में 13 साल का था और मेरा बेटा शाश्वत भी 13 साल का ही है ।

उन दिनों में मेरे पास काफी रूपया था लेकिन वो रूपया मेरे खाते में और उन दिनों एटीएम के मैं खिलाफ । स्थिति यह कि मेरी पत्नी के पास मेरे इलाज के लिए हाथ में पैसा ही नही बचा और मैं वेंटिलेटर पर । चित्तौड़ के तत्कालीन कलक्टर थे रवि जैन, उन्होने उस निजी अस्पताल के मालिक को फोन कर कहा कि अच्छा इलाज कीजिए, बाद में पैसा दिया जाएगा।

मैं वेंटिलेटर पर था , एक दिन देर रात लगभग ढाई बजे मेरी नींद खुल गई , मैने हनुमान जी को याद किया और कहा कि अभी तो मैने कुछ नही किया हैै , मुझे समय दो भगवन , मैं अच्छा करूंगा । रात को ही मैने मन ही मन हनुमान चालीसा का पाठ करना शुरू कर दिया , मुझे पता ही नही चला कि मैने पूरा पाठ किया या नही और मुझे नींद आ गई । अगले ही दिन से मेरी तबियत में सुधार आना शुरू हुआ और मात्र 12 दिनों में ही मैं चित्तौड़ के लिए रवाना हो गया जबकी चिकित्सक तो मेरे जिंदा रहने के बारें में ही संशय में थे , यह था मेरे हनुमान जी का चमत्कार ।

बाद में मुझे मेरे बेटे शाश्वत ने बताया कि पापा, जो आपसे हमेशा मदद लेते रहे , वो ही उन दिनों हमारा मोबाइल उठाया नही करते थे । उन दिनों बिरला सीमेंट में संयुक्त अध्यक्ष श्री निरंजन नागौरी थे , उन्होने भी संबल दिया । राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम के मेरे पत्रकार मित्र भी साथ बने रहे । सच तो यह है कि मुसीबत में ही पता चलता है कि आपका कौन है? एक होटल चलाने वाले यादव जी और उन दिनों मेरे साथ जुड़े अमित चेचाणी भी मेरे साथ बने रहे । एक अच्छी बात यह थी कि जिनसे अपेक्षा थी वो ही मेरे पास नही थे बाकी मेरे हनुमान जी हमेशा की तरह साथ बने ही रहे ।

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