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मेरी पहली और अंतिम गुरू मां ही है <
मेरी पहली और अंतिम गुरू मां ही है

(मेरी बात/अनिल सक्सेना)

रात दो बजे से मां की तबीयत खराब होना शुरू हुई , डाॅ मधुप बक्षी जी भाईसाहब ने रेगुलर दवाईयांे के अतिरिक्त पेट में दर्द, उल्टी, जी घबराने जैसी अन्य की भी दवाईयां पहले से ही बता रखी थी कि जब भी ऐसा लगे तो दे देना । भाईसाहब की बताई दवाईयां काम आई , सुबह पांच बजे तक वह ठीक हो गई और सो गई। सुबह डा. बक्षी जी को पूरी बात बताई तो उन्होने कहा चिंता की बात नही है और उन्होने कुछ निर्देश दे दिए ।

मां........ मेरे जीवन मंे बहुत महत्वपूर्ण शब्द है , सभी को मां बहुत प्यारी होती है और मुझे भी है। जब 13 साल का था पिताजी नही रहे , पापा पुलिस में थानेदार थे, अनुशासन मंे रहना उन्होने सिखाया । पापा के बाद मां ने ही संभाला और आज इस जगह खड़ा हुआ । बहुत संघर्ष किया और मां ने हमेशा मुझे संबल दिया, हर मुसीबत से लड़ना सिखाया और बहुत ही आसान तरीके से बताया कि यह सब तो जीवन का पार्ट है । आप यकीन करेंगें कि उन्होने जीवन की हर मुसीबत पर आसानी से जीतना सीखा दिया, हर दिन कुछ नया करना भी उन्होने ही सिखाया । मेरी धार्मिक प्रवृत्ति भी उन्ही की देन है। डर उनके करीब भी नही आया और शायद यही मेरी भी खासियत रही । उनके चरण स्पर्श कर घर से निकलना ही मुझे हर क्षेत्र में जीत दिलाता रहा है । बहुत प्यार करता हूं , मै अपनी मां से ।

पिछले बरस जनवरी में मां का दूसरी बार पैर टूट गया और तभी से हम मां के साथ ही सोने लगे । अब रात को गुड नाईट कर सोना और सुबह चार बजे मां की गुड माॅर्निंग की आवाज से उठना ही दिनचर्या की शुरूआत है। गायों को चारा खिलाना , रोटी खिलाना और कुत्तों के खाने का ध्यान रखने से मां के दिन की शुरूआत होती है और कोई जरूरतमंद आ जाए तो अपनी पहनी साड़ी भी उतार कर दे देना उनके लिए मामूली बात है। अभी उन्होने अपनी पेंशन का बहुत सारा रूपया धर्मराज श्री चित्रगुप्त मंदिर के जीर्णोद्वार और नये निमार्ण में लगाना शुरू कर दिया और अपने बेटे मतलब मुझे, मेरी पत्नी शांति और बेटे शाश्वत को भी कहा कि अपनी कमाई का कुछ अंश मंदिर में लगाओ । कुंभानगर गठीला हनुमान मंदिर परिसर में ललकार परिवार की ओर से भगवान राधा-कृष्ण की प्राण-प्रतिष्ठा हो या श्री चित्रगुप्त मंदिर परिसर में हनुमान मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा से लेकर दुर्गा माता की प्राण-प्रतिष्ठा हो सभी में मेरी मां ने ही अपनी पेंशन के रूपये से शुरूआत कर हमें कहा कि अब तुम लोग भी अपना अंश निकालो और यह भी निर्देश दिये कि और किसी से पैसा नही लेना । बहुत सीखा है मैने अपनी मां से , सच तो यह है कि मेरी पहली और अंतिम गुरू मेरी मां ही है। मां आप हमेशा मेरे साथ रहना , यही मेरी आपसे प्रार्थना है। ( 1949 ललकार समाचार पत्र )

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