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पोलिटिकल आइडियोलाॅजी कुछ भी हो लेकिन पत्रकारिता पर हावी क्यों ?
पोलिटिकल आइडियोलाॅजी कुछ भी हो लेकिन पत्रकारिता पर हावी क्यों ?

(अनिल सक्सेना/ललकार)

अंतरराष्ट्रीय स्वतंत्र संस्था‘ रिपोर्टर्स विदाउट बाॅर्डर्स‘ हर साल 180 देशों की प्रेस फ्रीडम रैंक जारी करती है । इस इंडेक्स में हिंदुस्तान की रैंक लगातार गिरती जा रही है। पिछले बरस 2020 में हिंदुस्तान 180 देशों में 142वे नम्बर पर था । संस्था ने कहा कि हिंदुस्तान में इस बरस प्रेस की आजादी का उल्लंघन हुआ, पत्रकारों पर पुलिस की हिंसा , राजनीतिक कार्यकर्ताओं का हमला और आपराधिक गुटों या भ्रष्ट स्थानीय अधिकारियों ने बदले की कार्रवाई की । हिंदुस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने इस संस्था के इंडेक्स को नकारते हुए ट्वीट किया कि ‘भारत में मीडिया को पूरी तरह स्वतंत्रता है, आज नही तो कल हम भारत की प्रेस स्वतंत्रता की गलत छवि बनाने वाले सभी सर्वे को एक्सपोज करेंगे ।

पिछले दिनों राजस्थान में भी पत्रकारों पर मामले दर्ज हुए और इसी तरह गुरूवार को इंडिया टुडे के पत्रकार राजदीप सरदेसाई, नेशनल हेराल्ड की वरिष्ठ सलाहकार संपादक मृणाल पांडे, कौमी आवाज के संपादक जफर आगा, द कारवां पत्रिका के संपादक और संस्थापक परेशनाथ, द कारवां के संपादक अनंत नाथ, और कार्यकाारी संपादक विनोद के जोस के खिलाफ राजद्रोह कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है। शिकायतकर्ता ने कहा कि ‘इन लोगों ने जानबूझकर गुमराम करने वाले और उकसाने वाली गलत खबरें प्रसारित की और अपने ट्वीटर हैंडल से ट्वीट किया । सुनियोजित साजिश के तहत गलत जानकारी प्रसारित की गई कि आंदोलनकारी को पुलिस ने गोली मार दी ।

अभी हरियाणा के स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पूनिया को भी हिरासत में लिया गया है। ‘द वायर‘ के संपादक के खिलाफ भी मामला दर्ज हुआ है।

सवाल यहां यह है कि सबसे पहले खबरों को प्रसारित करने की हड़बड़ाहट क्यों ? क्यांे नही पहले पूरी जानकारी ली जाए और फिर बाद में खबरों को प्रसारित किया जाए या ट्वीट किया जाए । दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आपकी पोलिटिकल आइडियोलाॅजी कुछ भी हो लेकिन पत्रकारिता पर आइडियोलाॅजी हावी क्यों हो ? सच को हमेशा पाठकों के समक्ष ले जाना ही सच्ची पत्रकारिता है।

आज कुछ मीडिया संस्थान व्यक्तिगत स्वार्थवश राजनीतिक एजेंडा चलाए हुए है और पत्रकारिता पर भी इसका सीधा असर दिखाई दे रहा है , आम जनता और पाठक भी इस बात को समझ रहे है। सीधी बात यह है कि हर व्यक्ति की अपनी पोलिटिकल आइडियोलाॅजी होती है और पत्रकार भी इससे अछूते नही है । पत्रकार भी कुछ राजनेताओं के कार्यो से प्रभावित होते है लेकिन अगर सच को सच ही रहने दिया जाए और गलत को हमेशा उजागर किया जाए तो पत्रकारिता पर कोई भी सवाल नही उठने वाला है।

दूसरा पहलू देखें तो इसमें भी कोई दो राय नही है कि एक पत्रकार को अपनी जिंदगी में कुछ एक-दो फर्जी केसों का सामना करना ही पड़ता है और अगर सच्ची पत्रकारिता करनी है तो एक अच्छे पत्रकार को ऐसी परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार भी रहना चाहिए ।

कुछ अपवादों के कारण ही पत्रकारिता पर सवाल उठते है लेकिन आज भी हिदुस्तान में मिशन पत्रकारिता जिंदा है और इसलिए ही सरकार को चाहिए कि पत्रकारों के लिए ‘पत्रकार सुरक्षा कानून‘ बनाने की पहल करें । ( Since 1949 ललकार )

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