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मीडिया का गिरता स्तर, क्या हम जिम्मेदार नही ?
मीडिया का गिरता स्तर , क्या हम जिम्मेदार नही ?

(अनिल सक्सेना /ललकार)

प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे युवा सौरभ बताते है कि मैं अखबार नही पढ़ता और ना ही कोई न्यूज चैनल देखता हूं । सौरभ आगे बताते है कि मुझे कई विश्वसनीय मंचों से आवश्यक सूचनाएं मिल जाया करती है। एक युवा संगठन से जुड़े इंजीनियरिंग कर रहे पदाधिकारी से संस्थापक अध्यक्ष किसी अखबार में छपी खबर की जानकारी मांगते है तो जवाब मिलता है ‘भैया मैं अखबार पढ़ता ही नही हूं ।

एडवोकेट आशी बताती है कि समाज में होने वाली कई घटनाओं की खबरें अगले दिन अखबारों में छपती ही नही है और इसका कारण व्यवसायिकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि सामाजिक सरोकार और आमजन से जुड़ी खबरें भी नदारद होती है। इसलिए ही युवाओं का अखबारों और न्यूज चैनलों पर से विश्वास खत्म होता जा रहा है। जयपुर के एडवोकेट नासीर खान बताते है कि शायद नेताओ और सरकारी अधिकारियों को अखबार पढ़ना जरूरी होता है इसलिए ज्यादातर अखबार इन लोगों के घरों में ही आते है। खान यह भी बतातें है कि अब तो प्रायोजित खबरों का जमाना आ गया है। खान यह भी बतातें है कि वे अखबार सिर्फ सूचनाएं प्राप्त करने के लिए पढ़ते है।

जब हम पढ़ाई करते थे तो हमें कहा जाता था कि प्रतिदिन अखबार पढ़ना चाहिए और उन्ही दिनों की आदत के कारण मैं आज भी प्रतिदिन अखबार पढ़ता हूं , हां यह जरूर है कि कई महिने हो गए न्यूज चैनल को देखे । मैं खबरों के लिए कुछ चुनिन्दा न्यूज वेबसाइट जरूर देखता हूं ।

अभी दिल्ली की सीमाओं पर 30 दिनो से भी ज्यादा से किसान आंदोलन चल रहा है । हम यहां अपनी मीडिया की बात ही कर लें कि ऐसा क्यों है कि यहां लोगों का मीडिया से विश्वास खत्म हो गया है। इन किसानों की लड़ाई सरकार से है लेकिन सबसे आश्चर्य की बात यह है कि किसान की अपनी मांगों के बैनर से भी ज्यादा यहां गोदी मीडिया के बहिष्कार के बैनर दिखाई देने लगे है। यह आन्दोलनरत् किसानों के मुंह पर स्थानीय चैनलों और अखबारों के नाम है । स्थिति यह है कि टॅ्राली टाइम्स जैसे नए अखबार का जन्म हो गया वहीं किसान एकता मंच चैनल भी बना दिया गया । रिपोर्टरों को माईक से अपने आईडी हटाने पड़े। यह तो अखबार और न्यूज चैनलों के मालिक को ही जानना होगा कि कारण क्या है ?

अभी कुछ दिन पहले की बात है, मुझसे स्टेट बैंक आॅफ इंडिया के चीफ मैनेजर मिलने आए । उन्होने मुझसे कई बातंे कि और यह भी पूछ लिया कि आप पत्रकारिता के अलावा क्या करते हो ? मैंने उन्हे जानकारी दी कि मैं सिर्फ पत्रकारिता ही करता हूं तो उन्हे बहुत ही आश्चर्य हुआ । उन्होने कहा कि कई पत्रकारों के अपने-अपने धन्धे भी है, इसलिए मैने यह सवाल आपसे पूछा ।

जरूर सोचिए , मीडिया के गिरते स्तर का जिम्मेदार कौन है ? शायद हम ही है । क्यों कि अगर हम प्रायोजित और गोदी मीडिया का बहिष्कार करने का सोच लेंगें तो यह मीडिया भी मिशन मीडिया में बदल जाएगी । अन्यथा अभी तो चैनल के स्टूडियों से गुंडई की जा रही है , कुछ दिनों के बाद अखबारों से भी ऐसी ही आवाजे, जो धीरे-धीरे सुनाई दे रही है वो तेजी से आने लगेगी । (Since 1949 ललकार समाचार पत्र)

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