मुख्य पृष्ठ पर वापिस जाये
लाॅकडाउन से उपजी बेरोजगारी को दूर करने का प्रयास करें , राजनीति तो होती रहेगी * मीडिया और सत्ता पक्ष * मुख्यमंत्री के निर्णयों से भ्रस्ट अधिकारियों पर गाज गिरना तय * भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पूनिया ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर चौगान स्टेडियम का नाम भाजपा नेता स्वर्गीय भंवरलाल शर्मा के नाम करने की मांग की * राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम प्रत्येक संभाग में करेगा ‘पत्रकार परिचर्चा‘ * राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम प्रत्येक संभाग में करेगा ‘पत्रकार परिचर्चा‘ * सहज और सरल व्यक्तित्व के प्रभावशाली व्यक्तित्व मोहन प्रकाश जी भाईसाहब ने दिल्ली की यादें ताजा की * ललकार के बेबाक कलम को एक घण्टे में लाखो पाठको ने पढ़ा * क्या राजस्थान में किसी भी संभाग से फोन नही उठाते भाजपा प्रदेशाध्यक्ष पूनिया ? * क्या इंसान की जान से ज्यादा राजनीति जरूरी है ? *
नही तो ..........एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा सरकार बनती रहेगी
नही तो............. एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा सरकार बनती रहेगी

(अनिल सक्सेना/ललकार)

राजस्थान के 12 जिलों के पचास निकाय चुनाव में 31 निकायों पर निर्दलीयों के हाथों में कमान होना प्रदेश में एक नए राजनीतिक परिवर्तन की ओर इशारा कर रहा है। हाल ही में हुए पंचायत चुनाव में भाजपा का बढ़त बनाना और कुछ ही दिन बाद के निकाय चुनाव में कांग्रेस के बढ़त के साथ ही निर्दलीयों के हाथ में कमान का आना प्रदेश के मतदाताओं की मानसिकता को भी दर्शा रहा है।

प्रदेश के कई जागरूक पत्रकारों से बात करने पर जानकारी मिलती है कि सच तो यह है कि राजस्थान का अधिकांश मतदाता कांग्रेस और भाजपा दोनो से ही ‘आजिज‘ आ चुका है। इसके बाद भी तीसरा विकल्प नही होने के कारण मतदाता एक बार कांग्रेस को तो दूसरी बार भाजपा को चुनने पर मजबूर है।

किरोड़ीलाल मीणा , घनश्याम तिवाड़ी और हनुमान बेनिवाल ने नई पार्टी बनाई जिसमें से मीणा और तिवाडी की पार्टी का हश्र जनता ने देख ही लिया और बेनिवाल कुछ क्षेत्रों में जातिवाद की राजनीति के कारण दिखाई दे रहें है। किरोड़ीलाल मीणा ने भी जातिवाद के आधार पर राजनीतिक दल बनाया तो दूसरी ओर घनश्याम तिवारी प्रदेश के मतदाताओं में लोकप्रिय चेहरा नही थे, जिसके कारण उनकी भी जमानत जब्त हो गई। यह तय है कि किसी एक जाति के दम पर राजस्थान पर राज नही किया जा सकता है।

कांग्रेस में अशोक गहलोत और भाजपा में वसुंधरा राजे लोकप्रिय चेहरा है और दोनो ही नेताओं की प्रदेश में पकड़ के साथ ही उनके अपने समर्थक है लेकिन इसके बाद भी दोनो को ही अपनी -अपनी पार्टीयों में विरोध का सामना करना पड़ रहा है । कुछ लोग कहतें है कि इससे पहले वाले भाजपा राज में अशोक गहलोत प्रदेश में निष्क्रिय थे लेकिन ऐसा नही था, उन दिनों वे भले ही किसी भी दूसरे प्रदेश के प्रभारी बने लेकिन उन्होने राजस्थान की राजनीति और प्रदेश के नेताओं से संपर्क बनाए रखा । इसका ही परिणाम निकला कि गहलोत प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने में सफल हुए ।

इसी तरह अभी यह माना जा रहा है या कुछ नेताओं के द्वारा यह दिखाया जा रहा है कि वसंुधरा राजे अभी सक्रिय नही है लेकिन प्रदेश के कई सक्रिय भाजपा नेता जानतें है कि वे राजस्थान के प्रत्येक विधानसभा के संपर्क में बनी हुई है और इसके साथ ही किसी परेशानी या समस्या होने पर वे कलक्टर या उस जिले के एसपी से भी संपर्क बना कर भाजपा कार्यकर्ता की बात रख रही है।

इसमें कोई दो राय नही है कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया एक कुशल संगठक है लेकिन अभी उनकी कई परीक्षाएं होना बाकी है। राजस्थान के कई जिलों में भाजपा के तीन-तीन गुट बने हुए है और इसी का परिणाम है कि अजमेर जैसे जिले में भाजपा का बहुमत होते हुए भी कांग्रेस के समर्थन से भाजपा की बागी जिला प्रमुख बनी तो दूसरी और मेवाड़ में जिला प्रमुख के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा का एक होना राजनीति की गिरावट को प्रदर्शित करता है । सवाल यह है कि क्या विचारधारा को दरकिनार कर राज करना ही भाजपा और कांग्रेस की प्राथमिकता रह गई है।

यह भी तय है कि राजस्थान में कांग्रेस या भाजपा की सरकार के समय में कई कमियां होती है तभी तो एक बार भाजपा तो दूसरी बार कांग्रेस की सरकार बन रही है। दोनो ही दलों ने सुधार नही किया तो अभी के निकाय चुनाव परिणाम से यह तय होता है कि अगर भाजपा और कांग्रेस दोनों में से किसी भी दल से कोई लोकप्रिय चेहरा पार्टी से अलग होकर जातिवाद से परे कोई नए राजनीतिक दल का गठन कर आगामी विधानसभा चुनाव में उतरता है तो बंगाल की ममता बनर्जी जैसे कई सालों तक राजस्थान पर राज कर सकता है। शर्त यह भी है कि उस नेता की लोकप्रियता और प्रदेश पर पकड़ के साथ ही धन की प्रचुरता भी हो तभी राजस्थान में नए राजनीतिक समीकरण बन सकतें है, नही तो एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस की सरकार बनती रहेगी । ( Since 1949 ‘ललकार‘ समाचार पत्र)

Share News on