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कहां जा रही है टीवी पत्रकारिता और हम
कहां जा रही है टीवी पत्रकारिता और हम

(अनिल सक्सेना/बेबाक कलम)

क्या पत्रकार होने के साथ ही जज भी बन गए ? क्या कोई भी पत्रकार या एंकर किसी भी घटना पर निर्णय सुनाने का अधिकारी है ? क्या हम अपने टीवी स्टूडियो पर बैठकर किसी को भी कुछ भी कहने के अधिकारी है ? क्या बोलने की आजादी के कारण हम किसी का भी मानमर्दन कर सकतें है ?

एक्टर सुशांत सिंह को न्याय मिलना चाहिए और अगर उसके साथ गलत हुआ है तो सीबीआई अपनी जांच में सभी पहलू सामने ला देगी लेकिन बढ़ते कोरोना संक्रमण और उसके कारण बढ़ रही बेरोजगारी और मरते लोगों को अनदेखा कर कंगना रनौत और रिया चक्रवर्ती जैसे मामलों को दिन-भर चलाना कहां की पत्रकारिता है ?

सांसद जया बच्चन ने सही ही तो कहा है कि जिन लोगों ने इंडस्ट्री में अपना नाम बनाया है अब वो उसे गटर कह रहें है, मैं पूरी तरह से इससे असहमत हूं । जया बच्चन के इस बयान के बाद अब मीडिया कंगना रनौत के ट्वीट को बता रही है, जिसमें वो कह रही है कि अगर जया बच्चन का बेटा आत्महत्या कर लेता तो क्या वे ऐसा ही कहती । अब बताइए कि क्या कंगना रनौत के इस तरह के बकवास बयानों को जगह देना जरूरी है ? अगर यह बात किसी आम आदमी को बोल दी जाए तो बोलने वाले के दांत शायद ही साबित बचे।

हम मानतें है कि बाॅलीवुड में भी कुछ लोग गंदे है लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई भी क्षेत्र अछूता है जहां गंदगी नही हो ? अब टीवी पत्रकारिता को ही देख लीजिए, एक पत्रकार साहब अपने टीवी स्टूडियों पर बैठकर दिन-भर चिल्लाते रहते है और वहां से ही अपने निर्णय भी सुना देते है। मुख्यमंत्री, गृहमंत्री और अन्य एक ही दल के नेताओं को अपने स्टुडियों पर बैठकर बाहंे चढ़ाकर धमकाने का कुत्सित प्रयास करते दिखाई दे रहे होते है। समझ नही आता है कि यह कैसी पत्रकारिता है ? सबसे बड़ी बात यह है कि वे ऐसा कोई भी पल खोना नही चाहते जहां पर वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खास बनकर नही दिखा सकते हो । मुझे तो लगता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी ऐसे पत्रकार की पत्रकारिता को देखकर हंसते ही होगंे कि कैसे-कैसे लोग, कैसी -कैसी पत्रकारिता कर रहें है ।

कोई भी पत्रकार किसी को न्याय दिलाए, अच्छी बात है लेकिन अपने स्टूडियांे में बैठकर निर्णय सुनाने लगे और वहां से साक्षात्कार देने के लिए अल्टीमेटम देने लगे , अपनी भाषा की मर्यादा ही भुल जाए तो यह कैसी पत्रकारिता मानी जाएगी ? दोषी तो ऐसे भी लोग है जो अपनी टीआरपी बढ़ाने के चलते टीवी स्टूडियों पर पहुंचकर बहस का हिस्सा बनते है और बिना कुछ अपनी बात कहे , सिर्फ एंकर की बुरी-भली सुनकर चले आते है।

अब तो ऐसा लगने लगा है कि कुछ भी, किसी के लिए कहो, विवाद पैदा करो , विवादास्पद बन जाओ और टीवी मीडिया के जरिए देश में फेमस हो जाओ, यही रीत अब देश में चलने लगी है। सबसे अच्छी बात यह है कि सत्ता पक्ष जो टीवी मीडिया को लाभ दे सकता है, उसका साथ दो और उनके पक्ष के दल जैसी भूमिका निभाते हुए उनके विरोधियों को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहो , अब तो कुछ लोगांे के लिए बस यही टीवी पत्रकारिता है। लेकिन इस सबके बाद भी अच्छी और सच्ची टीवी पत्रकारिता करने वाले भी कई हमारे देश में है, जो पत्रकारिता की सही परिभाषा लिख रहें हैं।

(लेखक अनिल सक्सेना राजस्थान के सबसे पुराने सन् 1949 से प्रकाशित साप्ताहिक अखबार “ललकार” के संपादक और राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम के संस्थापक अध्यक्ष है। )

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