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क्या श्रम क़ानून के ऐतिहासिक बदलाव से श्रमिक और नियोक्ता दोनो को मिलेगा फायदा * कृषि विधेयक का विरोध कितना जायज * एहतियात बिना क्या कोरोना बद से बदतर होगा ? * एहतियात बिना क्या कोरोना बद से बदतर होगा ? * कहां जा रही है टीवी पत्रकारिता और हम * अभी राजस्थान कांग्रेस में सबकुछ अच्छा नही * अभी राजस्थान कांग्रेस में सबकुछ अच्छा नही * विशेष समिति निभाएगी सोनिया गांधी के लिए निगरानी और समन्वय की जिम्मेदारी * राजस्थान सरकार के ट्रबल शूटर रहे अविनाश पांडे और अन्य नेताओं को दी अहम जिम्मेदारी * क्या कांग्रेस को आत्मविश्लेषण की जरूरत है ? *
अभी राजस्थान कांग्रेस में सबकुछ अच्छा नही
अभी राजस्थान कांग्रेस में सबकुछ अच्छा नही

अनिल सक्सेना/ बेबाक कलम

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी चतुराई से सरकार को तो बचा लिया लेकिन जिस तरह से प्रतिदिन घटनाएं हो रही है उससे लग नही रहा है कि प्रदेश प्रभारी अजय माकन अपने स्तर पर गहलोत और सचिन पायलट के बीच चल रहे शीतयुद्व को खत्म करा पाएंगें । सरल और सहज कुशल संगठक अजय माकन ने अजमेर संभाग से संपर्क का अभियान शुरू किया और यहीं पर ही पायलट और गहलोत खेमे के समर्थक आपस में भीड़ गए और पायलट समर्थक विधायक को अपनी ही सरकार की पुलिस के खिलाफ विरोध करना पड़ गया । सच तो यह है कि पायलट और गहलोत के बीच खाई इतनी बढ़ गई है कि कहीं भी ऐसा नही लग रहा है कि यह दोनो एक हो पाएंगे और राजस्थान कांग्रेस में एकता हो पाएगी ।

सूत्र तो यह भी बतातें है कि कुछ कांग्रेसी विधायक जो गहलोत खेमे में थे , वे भी गहलोत सरकार से संतुष्ट नही है लेकिन यह कुछ विधायक सोनिया गांधी के कारण तो कुछ विधायक अन्य कारणों से गहलोत के साथ बने रहे । कांग्रेस नेता प्रियकां गांधी के कारण सुलह का दिखावा तो हुआ लेकिन मन से एक नही हो पाए ।

नवनियुक्त कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविन्द डोटासरा एक जुझारू और सक्रिय परिपक्व नेता है और उन्हे जो दायित्व दिया गया है, उसे वे कुशलता से निभा लेंगे लेकिन सवाल यही है कि क्या प्रदेश भर में जो पायलट समर्थक है, वे उन्हे सहयोग करेंगे ? प्रदेश में जहां भी पायलट समर्थक सक्रिय है, वहां उन्होने अपना अलग ही गुट बना रखा है और वे समय-समय पर बताते भी है कि हम पायलट के साथ है। गुर्जर समाज का एक बड़ा तबका भी सचिन पायलट को दरकिनार करने पर नाराजगी प्रकट कर रहा है और इसका सीधा खामियाजा कांग्रेस को ही भुगतना पड़ेगा ।

सियासी संकटकाल के समय में जिन विधायकों ने गहलोत का साथ दिया है , वे भी सरकार में एडजस्ट होने के सपने देख रहे है । सवाल यह है कि क्या इन सभी विधायकों की महत्वकांक्षाओं को पूरा किया जा सकेगा ? और अगर यह नही हो सकता तो क्या एक बार फिर असंतोष का सामना कांग्रेस सरकार को करना पड़ेगा ?

राजनीतिक जानकार तो यह भी बतातें है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो पायलट के पास बागी विधायकों की संख्या भी बढ़ सकती है । अब देखते है कि राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत किस तरह से आगे भी सभी परिस्थितियों को अपने पक्ष में कर पाएंगे लेकिन यह भी सच है कि अभी राजस्थान कांग्रेस में सबकुछ अच्छा नही है।

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