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क्या कांग्रेस को आत्मविश्लेषण की जरूरत है ?
क्या कांग्रेस आलाकमान को आत्मविश्लेषण की जरूरत है ?

(अनिल सक्सेना/ललकार)

‘यक्ष प्रश्न‘ है कि क्या देश की 130 साल से भी ज्यादा पुरानी पार्टी एक बार फिर अपनी पुरानी प्रतिष्ठा और जमीन हासिल कर सकेगी ? पहले मध्यप्रदेश में कांग्रेस का बिखराव और उस बिखराव को कांग्रेस आलाकमान का देखते ही रह जाना और समय पर सही निर्णय नही लेना । इसके बाद राजस्थान में कांग्रेस का बिखराव होते हुए रह जाना। पंजाब में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को राष्ट्रीय राजनीति में लाने का प्रयास करना और अमरिंदर सिह का सख्ती से मना करना । क्या समय रहते कांग्रेस आलाकमान सही निर्णय लेने में सफल हो पा रहा है ? क्या कांग्रेस आलाकमान की कमजोरी के कारण ही राज्यों में असंतोष को दबाया नही जा पा रहा है ? या राज्यों में असंतोष को बढ़ाने में आलाकमान ही जिम्मेदार है ।

विधानसभा चुनाव से पहले राजस्थान की बात करें तो कांग्रेस आलाकमान ने ही अशोक गहलोत को राज्य से बाहर का प्रभार देकर यह दिखाने का प्रयास किया कि राजस्थान पीसीसी अध्यक्ष सचिन पायलट अपने स्तर पर खुले रूप से काम करें और सचिन पायलट ने प्रदेश भर में अध्यक्ष का दायित्व भी निभाया । कांग्रेस आलाकमान ने ऐसा प्रकट करने में कभी कमी नही की कि अगर कांग्रेस सरकार आती है तो सचिन ही मुख्यमंत्री बनेंगे । तो अब सवाल यहां यही उठता है कि सचिन को मुख्यमंत्री बनने का सपना दिखाया किसने ?

राजस्थान में बहुमत मिलने पर अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बना दिया गया, जिसके कि वे काबिल थे लेकिन क्या सचिन इस बात को हजम कर सकते थे । जब आलाकमान ने ही सचिन को मुख्यमंत्री बनाने के सपने दिखाए तो गहलोेत के मुख्यमंत्री बनने के बाद अंसतोष तो होना ही था और असंतोष शुरू हो गया।

सचिन ने अपने आपको अविनाश पांडे से ज्यादा गांधी परिवार के करीबी समझा और इसलिए उन्होने अपने अंसतोष को सोनिया गांधी और राहुल गांधी के समक्ष प्रकट करने की कोशिश की लेकिन पायलट ने कभी भी राजस्थान के प्रभारी अविनाश पांडे को अपनी बात कहने का प्रयास नही किया और अगर कुछ एक-आध बात कही तो अविनाश पांडे ने उसका हल भी निकाला । अब सवाल यह है कि जब राजस्थान प्रभारी को सचिन अपनी बात ही नही कहेंगे तो पांडे कैसे उनकी किसी समस्या का हल निकाल सकते थे?

कुछ लोग यह अफवाह उड़ा रहे है कि अविनाश पांडे ने गुटबाजी को कम करने का प्रयास नही किया तो एक बार फिर सवाल यह है कि जब सचिन पायलट अपनी बात पांडे से नही कहेंगे तो कैसे वे उनकी समस्या को हल कर सकते थे ? सचिन तो सीधे ही गांधी परिवार से संपर्क कर रहे थे तो गांधी परिवार को चाहिए था कि वे सचिन की समस्या सुनते और उसे समय रहते हल करते, जो कि उन्होने नही किया।

सचिन और गांधी परिवार का पेचअप हुआ तो सबसे पहले ईमानदारी से काम कर रहे और प्रदेश में कांग्रेस एवं सरकार को मजबूत करने वाले शख्स अविनाश पांडे से प्रभार हटा लिया गया । अविनाश पांडे कांग्रेस और गांधी परिवार के सच्चे समर्थक है ।

सवाल एक बार फिर यही है कि क्या अविनाश पांडे को राजस्थान मंे सरकार बचाने के स्थान पर सचिन पायलट का साथ देते हुए कांग्रेस को कमजोर करने का कार्य करना चाहिए था ? क्या अविनाश पांडे का कांग्रेस सरकार को बचाने के लिए मुख्यमंत्री गहलोत के साथ दिन-रात मेहनत करना गलत था ? क्या कांग्रेस में ईमानदारी से कार्य कर रहे सच्चे कांग्रेसियों का हश्र यही होता है ? क्या कांग्रेस सरकार को बचाने में साथ देने वाले कांग्रेसी विधायकों को भी दरकिनार किया जाएगा ? क्या सरकार को बचाने में साथ देने वालों को सरकार में एडजस्ट नही किया जाएगा ? क्या कांग्रेस में विरोध करने वालों का ही सुखद भविष्य होगा? अविनाश पांडे को प्रभारी पद से हटा देने से कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं में क्या संदेश जाएगा, यह कभी सोचा है कांग्रेस आलाकमान ने ? राजस्थान में इस तरह के कई सवाल उठ रहें है।

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की तरह ही राजस्थान में अशोक गहलोत मजबूत है और उनकी इन दिनों की कार्यशैली से स्पष्ट है कि वे आर-पार की लड़ाई के मूड में है । कांग्रेस आलाकमान ने गहलोत को राष्ट्रीय राजनीति में लाने का प्रयास किया तो तय है कि मध्यप्रदेश की तरह राजस्थान में भी भाजपा सरकार बनने में देर नही लगेगी । जिस तरह से पूरे देश में कांग्रेस कमजोर होती जा रही है और समय पर सही निर्णय के अभाव मंे गुटबाजी से कांग्रेस टूट रही है, उससे यह स्पष्ट है कि कांग्रेस आलाकमान को आत्मविश्लेषण करना जरूरी है कि उनसे गलतियां कहां हो रही है और उसे समय पर सुधारा कैसे जा सकता है । गांधी परिवार को यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि अभी राजस्थान में कांग्रेस का संकट खत्म नही हुआ है। दूसरी ओर कांगे्रस का प्रत्येक कार्यकर्ता चाहता है कि देश में कांग्रेस की सरकार बने , राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने तो कांग्रेस आलाकमान को भी समय रहते सही निर्णय लेने की जरूरत है।

(लेखक अनिल सक्सेना राजस्थान के सबसे पुराने सन् 1949 से प्रकाशित साप्ताहिक अखबार “ललकार” के संपादक और राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम के संस्थापक अध्यक्ष है। )

नोट- राजस्थान के सबसे पुराने सन् 1949 से प्रकाशित साप्ताहिक अखबार “ललकार” की ई-पत्रिका को पढ़ने के लिए पर क्लिक कीजिए ।

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