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क्या हनुमान बेनीवाल की राजनीति गहलोत-वसुंधरा का विरोध कर ही परवान चढ़ेगी ?
क्या हनुमान बेनिवाल की राजनीति गहलोत-वसुंधरा का विरोध कर ही परवान चढे़गी ?

(अनिल सक्सेना/ललकार)

नागौर जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित बरणगांव में रहने वाले हनुमान बेनिवाल को राजनीति विरासत में मिली , उनके पिता भी विधायक रहे है। वर्ष 1995 में राजस्थान काॅलेज में अध्यक्ष बने , 1996 में यूनिवर्सिटी लाॅ काॅलेज और 1997 में राजस्थान यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ अध्यक्ष बने ।

हनुमान बेनिवाल ने 2003 में पहली बार ओमप्रकाश चैटाला की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल से नागौर के मूण्डवा विधानसभा से चुनाव लड़ा, जिसमें वे हार कर दूसरे स्थान पर आए । इसके बाद वसुंधरा राजे ने 2008 में खींवसर से हनुमान बेनिवाल को टिकिट दिया और वे विधायक बने । हनुमान बेनिवाल ने विधायकी का टिकिट देने वाली वसुंधरा राजे का ही विरोध करना शुरू कर दिया और इसके चलते उन्हे भाजपा से निष्कासित कर दिया गया । पहली बार भाजपा से विधायक बनने के बाद और निष्कासित होने के बाद भी वे अशोक गहलोत सरकार से विधानसभा क्षेत्र में कई विकास के कार्य कराने में सफल रहे । इसके बाद भी वे कांग्रेस और भाजपा का विरोध करते रहे ।

बेनिवाल 2013 में निर्दलीय के रूप में विधायक बनने में कामयाब हुए और उसके बाद वे लगातार वसुंधरा राजे और भाजपा पर प्रहार करते रहे । माना यह जाता है कि हनुमान बेनिवाल के द्वारा गहलोत-वसुंधरा के विरोध करने से ही उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई । कांग्रेस और भाजपा का विरोध करने से ही हनुमान बेनिवाल का काफिला बढ़ता चला गया और वे मजबूत होते चले गए।

वर्ष 2018 में हनुमान बेनिवाल ने तीसरे मोर्चे के रूप में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का गठन किया और 58 सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़वाया, जिसमें से 3 सीटों पर जीत दर्ज की। शेखावटी क्षेत्र में बेनिवाल का प्रभाव बढ़ता चला गया । इस को देखते हुए भाजपा के केन्द्रीय आलाकमान ने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले हनुमान बेनिवाल से अपनी पार्टी भाजपा में विलय करने के लिए कहा लेकिन हनुमान बेनिवाल ने मना कर दिया । इसके बाद भाजपा ने नागौर की सीट पर बेनिवाल की आरएलपी से गठबंधन कर लिया। लोकसभा चुनाव में नागौर से हनुमान बेनिवाल जीते और राजस्थान की बाकी 24 सीटों पर भाजपा विजयी हुई। भाजपा के केन्द्रीय आलाकमान का मानना है कि बेनिवाल के भाजपा के साथ आ जाने से शेखावटी क्षेत्र में भाजपा को लाभ हुआ ।

इधर राजस्थान में कांग्रेस की राजनीति में सचिन पायलट की अति-महत्वकांक्षा के चलते विवाद हुआ लेकिन राजस्थान प्रभारी अविनाश पांडे और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की जोड़ी ने सभी स्थितियों को कांग्रेस के पक्ष में बना लिया और राजस्थान सरकार पर कोई संकट नही आया । लेकिन अभी गुरूवार को हनुमान बेनिवाल ने वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत के गठजोड़ का आरोप लगाकर प्रदेश की राजनीति में सनसनी फैला दी ।

सवाल यही है कि क्या हनुमान बेनिवाल की राजनीति गहलोत-वसुंधरा का विरोध कर ही परवान चढ़ेगी ? लेकिन यह तय है कि जिस तरह की हनुमान बेनिवाल की कार्यशैली रही है, उसे देखते हुए आने वाले दिनों में वे भाजपा से भी ज्यादा दिनों तक तालमेल नही बना पाएंगे ।

(लेखक अनिल सक्सेना राजस्थान के सबसे पुराने सन् 1949 से प्रकाशित साप्ताहिक अखबार “ललकार” के संपादक और राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम के संस्थापक अध्यक्ष है। )

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